ख़िलाफ़ हूँ……

मैं घूँघट के ख़िलाफ़ हूँ,
नज़रें वो झुकाए जिनकी नियत साफ़ नहीं
मैं कन्यादान के ख़िलाफ़ हूँ,
दान वस्तु का होता हैं और बेटी कोई वस्तु नहीं
मैं ऐसे पुरुष के ख़िलाफ़ हूँ,
जिसकी मर्दानगी रसोई में आने से ख़त्म हो जाती हैं
ख़िलाफ़ हूँ उस परवरिश के,
जो बेटो को बेलन पकड़ने से रोक देती हैं
ख़िलाफ़ हूँ ऐसे सम्मान के
जो केवल उम्र के कारण दिया जाता हैं
मैं ऐसी परंपराओं के ख़िलाफ़ हूँ
जिनमें महिलाओं को जकड़ा जाता हैं
ख़िलाफ़ हूँ समाज के दोगलेपन से
जिसमें उम्र लिंग हैसियत देख कर सम्मान दिया जाता हैं ….



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